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पूर्ण चक्र - आध्यात्मिक मुक्ति के बाद साधारण जीवन में लौटना — अद्वैत वेदांत, भगवद्गीता, ज़ेन और सूफ़ी परंपरा की दृष्टि से
अनुक्रम भूमिका बाज़ार क्यों लौटना पड़ता है १. जीवन्मुक्ति — जीते जी मुक्ति २. कर्मयोग — गीता का उत्तर ३. ज़ेन का बाज़ार में लौटना — दस बैल-चित्र ४. सूफ़ी बक़ा — फ़ना के बाद अस्तित्व ५. अनासक्ति, अलगाव क्यों नहीं है ६. सार — चार परंपराएँ, एक सत्य ७. दैनिक जीवन में अभ्यास ८. तीन छोटी कहानियाँ ९. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न समापन भूमिका बाज़ार क्यों लौटना पड़ता है जब भी हम 'आध्यात्मिक मुक्ति' या 'जागृति' की बात करते हैं, तो मन में सबसे पहले एक तस्वीर उभरती है — किसी पहाड़ पर बैठा साधु, आँखें बंद, संसार से दूर, शांत। यह तस्वीर गलत नहीं है, पर अधूरी है। यह पुस्तिका ठीक उस अधूरेपन को भरने के लिए लिखी गई है। चार बिल्कुल अलग-अलग परंपराएँ — भारत का अद्वैत वेदांत, भगवद्गीता, जापान का ज़ेन बौद्ध धर्म, और मध्य-पूर्व का सूफ़ी रहस्यवाद — अलग-अलग भाषाओं, अलग-अलग समय और अलग-अलग संस्कृतियों से आती हैं। फिर भी...